सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

समाजशास्त्र की प्रकृति

समाजशास्त्र की वास्तविक प्रकृति

( 1 ) समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है , प्राकृतिक विज्ञान नहीं - समाजशास्त्र का सम्बन्ध समाज , सामाजिक घटनाओं , सामाजिक प्रक्रियाओं , सामाजिक सम्बन्धों तथा अन्य सामाजिक पहलुओं से है , अतः समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है । प्रत्यक्ष रूप से इसका प्राकृतिक या भौतिक वस्तुओं से कोई सम्बन्ध नहीं है , अतः यह प्राकृतिक विज्ञान नहीं है । समाजशास्त्र स्वयं सम्पूर्ण सामाजिक विज्ञान नहीं है , अपितु सामाजिक विज्ञान की एक शाखा है । 

( 2 ) समाजशास्त्र एक वास्तविक ( निश्चयात्मक ) विज्ञान है , आदर्शात्मक नहीं - समाजशास्त्र वास्तविक घटनाओं का अध्ययन , जिस रूप में वे हैं , करता है तथा विश्लेषण में किसी आदर्श को प्रस्तुत नहीं करता या अध्ययन के समय किसी आदर्शात्मक दृष्टिकोण को नहीं अपनाता , अतः यह एक वास्तविक विज्ञान है , आदर्शात्मक नहीं । अवलोकन प्रविधि द्वारा आँकड़ों के संकलन तथा कार्य - कारण सम्बन्धों के अध्ययन पर बल देने के कारण भी यह एक वास्तविक विज्ञान है । समाजशास्त्र इस बात का अध्ययन नहीं करता कि क्या होना चाहिए अपितु इस बात का अध्ययन करता है कि वास्तविक स्थिति क्या है । 

( 3 ) समाजशास्त्र अमूर्त विज्ञान है , मूर्त विज्ञान नहीं- अन्य सामाजिक विज्ञानों की तरह समाजशास्त्र एक अमूर्त विज्ञान है , क्योंकि इसकी विषय - वस्तु जैसे समाज , सामाजिक सम्बन्धों सामाजिक संस्थाओं , प्रथाओं , विश्वासों इत्यादि को देखा या छुआ नहीं जा सकता । उदाहरण के लिए , संस्थाओं को हाथ में लेकर नहीं देखा जा सकता और न ही प्रथाओं को तराजू में तोला जा सकता है । समाज भी अमूर्त है , क्योंकि इसे सामाजिक सम्बन्धों ( जो कि स्वयं अमूर्त है ) का ताना - बाना माना गया है । अतः समाजशास्त्र एक अमूर्त विज्ञान है , मूर्त नहीं । रोबर्ट बीरस्टीड का कहना है कि समाजशास्त्र मानवीय घटनाओं के मूर्त प्रदर्शन में विश्वास न रखकर उन स्वरूपों और प्रतिमानों को मान्यता देता है जो घटना विशेष से सम्बन्धित हैं ।

( 4 ) समाजशास्त्र एक विशुद्ध विज्ञान है , व्यावहारिक विज्ञान नहीं - समाजशास्त्र विशुद्ध विज्ञान है , क्योंकि इसका प्रमुख उद्देश्य मानव समाज से सम्बन्धित सामाजिक घटनाओं का अध्ययन , विश्लेषण एवं निरूपण कर ज्ञान का संग्रह करना है । विशुद्ध विज्ञान चूँकि सैद्धान्तिक होता है इसलिये इसके द्वारा संचित ज्ञान अनिवार्य रूप से व्यावहारिक उपयोग में नहीं लाया जा सकता । रोबर्ट बीरस्टीड ने स्पष्ट कर दिया है कि इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि समाजशास्त्र व्यर्थ या अव्यावहारिक विज्ञान है , परन्तु समाजशास्त्र की इसमें कोई रुचि नहीं है कि प्राप्त ज्ञान का प्रयोग व्यावहारिक क्षेत्रों पर कैसे किया जा सकता है । 

( 5 ) समाजशास्त्र तार्किक एवं आनुभाविक विज्ञान है- समाजशास्त्र तर्कों एवं अनुभव पर आधारित एक विज्ञान है । इसमें सामाजिक घटनाओं एवं तथ्यों की तर्कों के आधार पर व्याख्या की जाती है । साथ ही इसमें अध्ययन अनुसंधान क्षेत्र में जाकर किया जाता है , पुस्तकालय में बैठकर नहीं , अतः यह अनुभवाश्रित भी है । समाजशास्त्र किसी भी सुनी सुनाई अथवा कही गई बात पर विश्वास नहीं करता वरन् स्वयं जाँच एवं विश्लेषण करके सत्यता की पुष्टि करता है । समाजशास्त्र के निष्कर्ष विवेकपूर्ण तथा अनुभव पर आधारित होते हैं । यह सत्य है कि समाजशास्त्र तर्क के आधार पर वास्तविक घटनाओं का अध्ययन करता है , लेकिन इसके साथ - साथ अनुभव के आधार पर कम उपयोगी तथ्यों की पूर्णतः उपेक्षा भी नहीं करता है । 

( 6 ) समाजशास्त्र सामान्य विज्ञान है , विशेष विज्ञान नहीं समाजशास्त्र में सामाजिक जीवन की सामान्य घटनाओं का सामान्यीकरण करके , सामान्य नियमों का निर्माण किया जाता है सामान्य परिस्थितियों में सामान्य रूप से लागू होते हैं । अतः समाजशास्त्र एक सामान्य है , विशेष विज्ञान नहीं । विज्ञान समाजशास्त्र की वैज्ञानिक प्रकृति के बारे में रोबर्ट बीरस्टीड द्वारा बताई गई विशेषताओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि समाजशास्त्र एक ऐसा सामाजिक विज्ञान है जो निरपेक्ष , वास्तविक , विशुद्ध , अमूर्त और सामान्य होने के साथ - साथ तार्किक तथा अनुभवाश्रित भी है । यह प्राकृतिक " विज्ञान , विशेष विज्ञान , व्यावहारिक विज्ञान , आदर्शात्मक विज्ञान तथा मूर्त विज्ञान नहीं है ।





टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सामाजिक अनुसंधान की विशेषताएं,प्रकृति,उद्देश्य।

सामाजिक अनुसंधान की विशेषताएं ( 1 )सामाजिक तथ्यों क खोज - सामाजिक अनुसन्धान की सबसे प्रमुख विशेषता यह होती है कि इसका सम्बन्ध सामाजिक सन्दर्भ से होता है । सामजिक जगत् ही अनुसन्धान को सामाजिक का दर्जा प्रदान करता है । प्रत्येक नहीं कहा जा सकता है । सामाजिक का बहुत सरल आशय है अनुसन्धान मानवीय व्यवहारों , मानव समूहों , अन्तः सम्बन्धों , प्रक्रियाओं आदि मानवीय प्रघटना से सम्बन्धित होता है  ( 2 ) सामाजिक सन्दर्भ से सम्बन्धित - इसके अन्तर्गत सामाजिक यथार्थ से सम्बन्धित नवीन तथ्यों का अन्वेषण किया जाता है पुराने तथ्यों की प्रामाणिकता की जाँच जाती है , क्योंकि समय के साथ - साथ नवीन प्रविधियों के प्रादुर्भाव से अवधारणाओं व सिद्धान्तों को विकसित करने की आवश्यकता होती है । अत : पुराने तथ्यों की प्रामाणिकता का मूल्यांकन करते हुए यदि आवश्यक होता है तो इन्हें संशोधित किया जाता है ।  ( 3 ) कार्य - कारण सम्बन्धों का स्पष्टीकरण - सामाजिक अनुसन्धान में सामाजिक यथार्थ के विभिन्न पहलुओं से सम्बन्धित तथ्यों में कार्य - कारण सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया जाता है और इसी आधार पर अधिक निश्चयता...

कस्बा किसे कहते है?

कस्बे का अर्थ ' कस्बा ' गाँव और नगर के बीच की स्थिति है । मोटे तौर पर कस्ब की संख्या गांव से अधिक किन्तु नगर से कम होती है । इसी प्रकार गाँव में कुछ इस प्रकार की वशेषताएँ आ जाती हैं जो प्रायः नगरों में पाई जाती हैं तो उसे कस्बा कहा जाता है । इसको इस रूप में भी कहा जा सकता है कि बड़े गाँव में जब नगरीय विशेषताओं का समावेश होने लगता है तो उसे कस्बे की संज्ञा दी जा सकती है ।  समाज किसे कहते हैं? सिद्धान्त किसे कहते हैं? सिद्धान्त के प्रकार गाँव,कस्बा और नगर में भेद  गाँव, कस्बा और नगर में भेद का आधार मुख्य रूप से जनसंख्या माना गया है । 1000 तक की आबादी वाली बस्ती को गाँव , 5,000 से 50,000 तक की आबादी वाली बस्ती को कस्बा तथा 50,000 से अधिक की बस्ती को नगर की संज्ञा दी जा सकती है । भारत में सन् 1901 की जनगणना में कस्बे की अवधारणा को Imperial Census Code के अनुसार स्पष्ट किया गया । इसके अनुसार ' कस्बे ' के आधार इस प्रकार हैं-  ( i ) किसी भी प्रकार की नगरपालिका हो ,  ( ii ) नगरपालिका के क्षेत्र में सिविल लाइन क्षेत्र न हो , ( iii ) सभी निवासी लगभग स्थायी हों ,  ( iv ) क...

उपकल्पना का अर्थ एवं परिभाषा

उपकल्पना का अर्थ एक ऐसा विचार अथवा सिद्धान्त जिसे अनुसन्धानकर्ता अध्ययन के लक्ष्य के रूप में रखता है तथा उसकी जाँच करता है, तथा  अध्ययन के निष्कर्ष में उपकल्पना को सत्य सिद्ध होने पर एक सिद्धान्त के रूप में स्थापित करता है। असत्य सिद्ध होने पर त्याग देता है। इस प्रकार से उपकल्पना एक कच्चा सिद्धान्त है। उपकल्पना की परिभाषा पी . एच . मान ने बहुत ही सूक्ष्म परिभाषा दी है , " प्राक्कल्पना एक अस्थाई अनुमान  सिद्धान्त किसे कहते हैं? सिद्धान्त के प्रकार समाज किसे कहते हैं? डोबिनर के अनुसार , " प्राक्कल्पनाएँ ऐसे अनुमान हैं जो यह बताते हैं कि विभिन्न तत्व अथवा परिवर्त्य किस प्रकार अन्तर्सम्बन्धित हैं । "  जिनर का कथन है , " एक प्राक्कल्पना घटनाओं के मध्य कारणात्मक अथवा अन्तर्सम्बन्धों के विषय में एक अनुमान है । यह एक ऐसा अस्थाई कथन है जिसकी सत्यता अथवा मिथ्या सत्यता को सिद्ध नहीं किया गया है । "  धर्म का अर्थ तथा परिभाषायें धर्म की विशेषतायें प्रत्यक्षवाद की परिभाषा एफ . एन . कर्लिजर का कहना है , " एक प्राक्कल्पना दो या दो से अधिक परिवयों के बीच सम्बन्ध प्रदर्शित ...