माध्यिका / मध्यांक ( Median ) माध्यिका एक स्थिति सम्बन्धी माध्य है । माध्यिका किसी समंक ( score ) श्रेणी के मध्य वाले पद के मूल्यों को कहते हैं , जबकि किसी समंक श्रेणी के मूल्यों को आरोही ( Ascending ) अथवा ( Descending ) अवरोही क्रम में व्यवस्थित कर लिया जाता है । इस प्रकार माध्यिका समंक श्रेणी को दो बराबर भागों में विभाजित करती है । माध्यिका के एक भाग सभी पद माध्यिका से बड़े होंगे । माध्यिका के अर्थ को विभिन्न विद्वानों ने अपनी निम्नलिखित परिभाषाओं के द्वारा स्पष्ट किया है
माध्यिका ( Median ) की परिभाषा
कोनोर ने लिखा है कि , “ माध्यिका समंक श्रेणी का वह पद है जो समूह को दो समान भागों में इस प्रकार विभाजित करता है कि एक भाग में समस्त मूल्य माध्यिका से अधिक और दूसरे भाग में समस्त मूल्य माध्यिका से कम होते हैं ।
डी.एन. एलहैन्स के अनुसार , “ जन तक समंक श्रेणी आरोही अथवा अवरोही क्रम में व्यवस्थित होती है तो इस समंक श्रेणी को दो बराबर भागों में विभाजित करने वाले मूल्य को हम मध्यांक या माध्यिका कहते हैं । "
जे.सी. चतुर्वेदी के अनुसार , “ यदि एक श्रेणी के पदों को उनके परिणामों के आधार पर आरोही अथवा अवरोही क्रमों से लगाया जाए तो बिल्कुल मध्य वाली राशि के मान ( मूल्य ) अथवा माप को ही माध्यिका कहा जाएगा ।
किसी समंक श्रेणी के मूल्यों को यदि आरोही अथवा अवरोही क्रम में व्यवस्थित कर लिया जाए तो मूल्य मध्य बिन्दु होगा वही माध्यिका कहलाएगा ।
माध्यिका ( Median ) की विशेषताएँ
( 1 ) माध्यिका समंक श्रेणी के बिल्कुल मध्य भाग पर केन्द्रित होती है ।
( 2 ) माध्यिका सम्पूर्ण श्रेणी को दो बराबर भागों में विभाजित करती है , जिसमें एक भाग मैं माध्यिका से कम एवं दूसरे भाग में माध्यिका से अधिक मूल्य होता है ।
( 3 ) माध्यिका के लिए समंक श्रेणी को आरोही अथवा अवरोही क्रम में लगाया जाता है ।
( 4 ) माध्यिका स्वयं मध्य वाला पद नहीं होता बल्कि उस पद का मूल्य माध्यिका माना जाता है ।
( 5 ) माध्यिका को प्रायः पद मूल्यों की क्रमिक वृद्धि पर ही आधारित किया जाता है
माध्यिका ( Median ) के गुण
( 1 ) माध्यिका में सरलता का गुण विद्यमान है क्योंकि इसे समझना और ज्ञात करना सरल है ।
( 2 ) माध्यिका श्रेणी के मध्य में स्थित मूल्य होता है अतः यह सीमान्त मूल्यों से प्रभावित नहीं होता है ।
( 3 ) माध्यिका का निर्धारण निश्चित किया जा सकता है। यह बहुलक की तरह अनिश्चित नहीं होता है ।
( 4 ) खुले सिरे वाली श्रेणी से भी माध्यिका ज्ञात किया जा सकता है ।
( 5 ) माध्यिका की गणना रेखाचित्र द्वारा भी की जा सकती है
माध्यिका ( Median ) के दोष / सीमाएँ
( 1 ) माध्यिका मूल्य - निर्धारण के लिए समंकों को आरोही अथवा अवरोही क्रम में व्यवस्थित करना पड़ता है ।
( 2 ) सतत् श्रेणी में तो माध्यिका निर्धारण इस मान्यता पर आधारित है कि वर्गान्तर में आवृत्तियाँ समान रूप से व्यवस्थित हैं , किन्तु यह मान्यता वास्तविक नहीं है ।
( 3 ) माध्यिका मूल्य एवं पदों की संख्या दी हुई हो तो सभी पदों के मूल्यों का योग प्राप्त नहीं कर सकते । अतः उच्चतर गणितीय क्रियाओं में इसका उपयोग बहुत कम किया जाता है
( 4 ) माध्यिका पद मूल्यों के आकार से प्रभावित न होकर केवल पदों की संख्या से प्रभावित होती है । अतः श्रेणी का सही प्रतिनिधित्व नहीं होता है।
( 5 ) आवृत्तियों के अनियमित होने पर एवं पदों की संख्या कम होने पर माध्यिका केन्द्रीय प्रवृत्ति का सही माप नहीं कर सकता है ।
( 6 ) यदि पदों की संख्या कम ( Even ) है तो माध्यिका किसी पद विशेष का वास्तविक मूल्य नहीं होता है तथा दो पदों के माध्य मूल्य को ही माध्यिका मान लिया जाता है ।
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