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कर्म का सिद्धान्त

समाजशास्त्र में कर्म का सिद्धान्त

कर्म का सिद्धान्त गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म के सिद्धान्त को बड़े अच्छे ढंग से समझाया है महाभारत में इस बात पर बल दिया गया है कि पूर्व जन्म में व्यक्ति ने जैसे कर्म किए हैं , उसी के फल उसे इस जन्म में प्राप्त हो रहे हैं । लेकिन गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि व्यक्ति के पूर्व जन्म के कर्मों की अपेक्षा वर्तमान जीवन के कर्मों का महत्त्व अधिक होता है । मनुष्य जैसे कर्म करता है वैसी ही मानव की प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता चलता है कर्मयोगी मनुष्य जीवन में कभी कस्ट नहीं उठाते हैं और समाज में अपना स्थान स्वयं बनाते हैं । कर्म भाग्य पर आधारित नहीं है , बल्कि भाग्य कर्म पर आधारित है यदि व्यक्ति के कर्म बदल जाते हैं तो उसके भाग्य का प्रभाव अपरे आप बदल जाता है । वस्तुतः कर्म के अनुसार ही मनुष्य के भाग्य और उसकी सफलता का निर्णय होता है । अतः यह कथन सत्य है कि व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है ।

डॉ . राधाकृष्णन् ( Dr. Radhakrishnan ) का कथन है कि , " कर्म का सिद्धान्त व्यक्ति भाग्य को बाँधता नहीं है बल्कि प्रत्येक परिस्थिति में व्यक्ति को अपने अभ्युदय अथवा विकास की छूट देता है । " 

यद्यपि कुछ विद्वानों का कहना है कि कर्मवाद भाग्यवाद को बढ़ावा देता है अर्थात कम पढ़े - लिखे लोग अपनी प्रगति तथा उन्नति के लिये इसलिये प्रयत्न नहीं करते हैं कि वे चाहे जितना प्रयत्न करें , लेकिन प्राप्त वही होगा जो उनके पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार उनके भाग्य में लिखा है । विद्वानों का यह मत निराधार है । कर्मवाद भाग्यवाद को बढ़ावा नहीं देता है वरन् कर्मवाद व्यक्ति को इस बात की प्रेरणा देता है कि अपने कर्मों के आधार पर व्यक्ति जैसा चाहे वैसा अपने भाग्य का निर्माण कर सकता है । 

कर्म के सिद्धान्त का महत्त्व

( 1 ) जीवन में आशावाद का संचार - कर्म का सिद्धान्त मनुष्यों को अपने कमों में सुधार करके आशावादी बनने की प्रेरणा देता है । कर्म का सिद्धान्त यह बताता है कि मनुष्य अपने कर्मों में सुधार लाकर अपने दुर्भाग्य को सोभाग्य में बदल सकता है । अच्छे कर्म करके मनुष्य अपने दुःखों को सुखों में बदल सकता है । इस प्रकार कर्म का सिद्धान्त जीवन में आशावाद संचार समाज का एक उपयोगी सदस्य बनने में सहायता देता है कर्म के सिद्धान्त के करके मनुष्य को इस गत्यात्मक पक्ष के महत्त्व को सभी विद्वान एक मत से स्वीकार करते हैं ।

( 2 ) नैतिक जीवन का विकास - कर्म का सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि भौतिकता अन्त में व्यक्ति के कष्टों का कारण ही बनती है । केवल नैतिक जीवन के द्वारा ही मनुष्य जीवन के तमाम कष्टों से मुक्ति पाने में समर्थ होता है । यह सिद्धान्त बताता है कि व्यक्ति को अपने कर्मों का फल निश्चय ही भोगना पड़ता है , इसलिये व्यक्ति को चाहिये कि वह दुष्कर्मों को छोड़कर पुण्य कर्म करे । पुण्य - कर्मों में वह शक्ति है जो व्यक्ति के पूर्व जन्म के बुरे कर्मों का प्रभाव कम कर सकती है । सच पूछा जाये तो व्यावहारिक जीवन में अनेक लोग नैतिकता का जीवन इसी विश्वास के कारण जीते हैं कि शायद उनके पूर्व जन्म के बुरे कर्मों का इस जन्म पर पड़ने वाला प्रभाव कुछ कम हो जाये और उनके जीवन में दुःख कम हो जाये । 

( 3 ) सामाजिक कल्याण में वृद्धि - कर्म का सिद्धान्त व्यक्तिवादी न होकर समष्टिवादी है । इसका अर्थ यह है कि बाह्य रूप से इनका सम्बन्ध व्यक्तिगत कर्तव्य भावना के होते हुए भी आन्तरिक रूप से सम्पूर्ण समाज के कल्याण से सम्बन्धित हैं इस सिद्धान्त का आधार निष्काम रूप से स्वधर्म का पालन करना और सभी प्राणियों में समता का भाव रखना है । ये दोनों ही आधार समाज कल्याण में वृद्धि करते हैं । कर्म के सिद्धान्त में ' त्याग ' और ' आत्मसमर्पण ' की भावना भी समाज कल्याण में वृद्धि करती है । 

( 4 ) समस्त सामाजिक व्यवस्थाओं का आधार - कर्म के सिद्धान्त के कारण ही प्राचीन काल से लेकर आज तक सभी सामाजिक व्यवस्थायें संगठित बनी रह पायी हैं । यद्यपि आज के भौतिकवादी युग में मनुष्य के विचारों एवं दृष्टिकोण में पर्याप्त परिवर्तन आ गया है लेकिन फिर भी कर्म के सिद्धान्त में विश्वास होने के कारण आज भी पढ़े लिखे लोग अपने दायित्वों को पूरा करते हैं धर्म के महत्त्व को काफी सीमा तक स्वीकार करते हैं और विभिन्न संस्कारों के प्रति मन में आस्था

रखते हैं । कर्म का सिद्धान्त सभी वर्णों के सदस्यों को अपनी स्थिति के प्रति आश्वस्त करके उन्हें अपने दायित्वों को पूरा करने की प्रेरणा देता रहा है । इसलिये ही अनेक क्रान्तियों एवं परिवर्तनों के बाद आज भी समाज में एक व्यवस्था बनी हुई है । इस प्रकार सम्पूर्ण हिन्दू सामाजिक व्यवस्था कर्म के सिद्धान्त से बहुत प्रभावित है ।

( 5 ) सामाजिक संघर्षों को कम करने में सहायक - कर्म के सिद्धान्त ने समाज में संघर्षों को कम करने में बड़ी सहायता दी है । सामाजिक संघर्षों का सबसे प्रमुख कारण अपनी स्थिति के प्रति असन्तोष का अनुभव करना और परिश्रम के बाद भी जीवन में असफल रहना है । ऐसी स्थिति में कर्म के सिद्धान्त ने लोगों को यह समझाया कि यह सब उनके अपने पूर्व जन्म के कर्मों का फल है , उन्हें अपनी सामाजिक स्थिति के प्रति आश्वस्त किया और साथ ही यह भी विश्वास दिलाया कि समाज में दुर्जनों को जो सुख मिल रहा है , उसका कारण सामाजिक व्यवस्था का दोष नहीं है , बल्कि स्वयं उन व्यक्तियों के अपने पूर्व - जन्म के कर्मों का फल है ) इस विश्वास ने हो हमारे समाज की अनेक क्रान्तियों से रक्षा की और सफलता की स्थिति में भी व्यक्ति को अपने धर्म का निरन्तर पालन करते रहने की प्रेरणा दी है ।

( 6 ) पुनर्जन्म के भय से मुक्ति- सामान्यतः सभी लोग पुनर्जन्म विश्वास करते हैं और जीवन का अन्तिम समय आने से पूर्व ही पुनर्जन्म की चिन्ताओं से घिर जाते हैं । वे इस चिन्ता डूब हैं कि पता नहीं उन्हें अगला जन्म किस योनि में प्राप्त होगा और न मालूम कितनी यातनायें भोगनी पड़ेंगी । पुनर्जन्म के इस भय से कर्म का सिद्धान्त ही व्यक्ति को मुक्ति दिलाका उसे कर्म करने की प्रेरणा देता है यह सिद्धान्त स्पष्ट करता है कि पुनर्जन्म के बन्धन से मुक्ति पाई जा सकती यदि व्यक्ति निष्काम रूप से कर्म और ज्ञान की साधना करे । कर्मों के द्वारा पुनर्जन्म को सुधारा जा सकता है और अच्छे कर्म न करने पर पुनर्जन्म बिगड़ सकता है । इस प्रकार कर्म के सिद्धान्त ने हिन्दू समाज को पुनर्जन्म के भय से मुक्ति भी दिलाई है और पुनर्जन्म का भग दिखाकर उसे सत् कर्म करने की ओर प्रेरित भी किया है  इस प्रकार कर्म के सिद्धान्त का मानव जीवन में सदा से बहुत महत्त्व रहा है और अनेक दोषों के उत्पन्न हो जाने के बावजूद आज भी इस सिद्धान्त का महत्त्व घटा नहीं है ।







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